Tuesday, 15 December 2020

आरएसएस, भाजपा की रणनीति और क्रांतिकारियों के कार्यभार:

 आरएसएस, भाजपा की रणनीति और क्रांतिकारियों के कार्यभार:

संक्षिप्त में; मुसलमानों से नफरत फैलाने के पीछे सत्ता पर काबिज होना और पुंजीपति वर्ग की दलाली करना है, कमीशन के लिए। जब कि ब्राह्मणवादी मानसिकता भारतीय समाज की मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कुरीतियां, जो सैकड़ों वर्षों से चल रही हैं, का सार है। दलितों और आदिवासियों को सामाजिक और आर्थिक रूप से दबाकर अगड़ी जाति ने सत्ता कब्जा कर रखा है, जो कई परिवर्तनों के साथ पूंजीवादी भारत में बरकरार है।
कॉंग्रेस छुप कर “प्रजातंत्र” के मुखौटे के साथ, पूंजीवाद के लिए काम करती थी, जब कि भाजपा खुल्लमखुल्ला करती है।
हिंदू मुसलमान, फर्जी देशवाद और धार्मिक उन्माद का फायदा “अंधभक्तों की सेना” है और हर फासीवादी निर्णय लेने में आसानी है। ये अंधभक्त तमाशा, शक्ति केंद्र और व्यक्तिवाद के लिए ललाईत रहते हैं, जो आरएसएस उन्हें लगातार पीला रहा है, फासीवाद का एक महत्वपूर्ण चरित्र है। अंधभक्तों को अज्ञानता और अंधविश्वास का आहार भरपूर मिल रहा है।
ऐसी परिस्थिति में, फासीवाद का प्रतिरोध सर्वहारा क्रांति से ही संभव है।

मजदूर वर्ग में अधिकांश दलित, आदिवासी (और अल्पसंख्यक समुदाय के भी) ही हैं। अगड़ी जाति के सदस्यों की कमी नहीं है पर आज भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण यह समुह और ओबीसी तक टूट गये हैं। सर्वहारा वर्ग की एकता (और प्रतिरोध) कमजोर पड़ गया है, हालांकि वह पहले से भी दिशाहीन हो चुका था, वामपंथी दलों के भटकाव के कारण, जिसने वर्ग संघर्ष का रास्ता त्याग कर संसदीय और सम्वैधानिक पथ चुना, मौकापरस्ती और वर्ग समन्वय को तरजीह दी। दक्षिणपंथी विपक्ष बिखर चूका है, और इससे कोई भी संभावना नहीं बनती है जनता के लिए या फासीवाद के खिलाफ मोर्चा में|
आज परिस्थिती विषम है। मजदूर वर्ग और गरीब, सीमांत, छोटे और मझोले किसानों के ऐतिहासिक प्रतिरोध धरना और प्रदर्शन के बावजूद सत्ताधारी और पुंजीपति वर्ग बेखौफ है (कम से कम, अपना शोषण और दमन का अधिकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं है) और धड़ल्ले से जनता और देश की सम्पत्ति को लुट रहे हैं।
क्या हम, क्रांतिकारी और प्रगतिशील लोग, पुराने ढर्रे पर प्रतिकात्मक विरोध करते रहें? हाल फिलहाल में, ऐसे विरोध अमेरिका में बड़े स्तर पर हुए हैं, रंग भेद नीति के खिलाफ। पर, दास प्रथा के खत्म होने के बावजूद, कुछ बदलाव के साथ, रंग के आधार पर अमेरिकी सर्वहारा वर्ग की एकता को तोड़ने की कोशिश और सफलता भी पूंजीपतियों, साम्राज्यवादी और फासीवादी ताकतों के पक्ष में ही है। अब, खास तबकों में वर्गीय आधार पर एकता और संघर्ष को तवज्जो दी जा रही है। मार्क्सवादी लेनिनवादी विचारधारा और क्रन्तिकारी रास्ता का विश्लेषण और उसके सामायिकता पर गहन विचार और बहस चल रहा है|
भारत में, या विश्व में कहीं भी, पूंजीवादी शोषण और जुल्मों के खिलाफ यदि संघर्ष को सफल करना है तो सिर्फ वर्गीय संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है। इस संघर्ष में सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित जनता, स्त्री मजदूरों का साथ अनिवार्य है समाजवादी क्रांति के सफलता के लिए। इस मुहीम के दौरान ही जातीय, धार्मिक, लैंगिक प्रतारण के खिलाफ भी मुहीम तेज होगा|

मजदूर एकता जिंदाबाद!

इंकलाब जिंदाबाद!


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