Sunday, 21 May 2017

भीम आर्मी और दलित मुक्ति का प्रश्न

सर्वहारा सर्वहारा

भीम आर्मी के साथी यह अच्छी तरह समझ लें कि उनके सारे मौजूदा और भावी मुद्दे अंततः मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में जालिम शासकों-शोषकों यानि पूँजीपति-जमींदार वर्ग और उनके सर्वेसर्वा साम्राज्यवाद से सड़कों पर, फैक्टरियों-खदानों में और खेत खलिहानों में जीवन और मरण की लड़ाई लड़ते हुए ही तय होंगे, अन्यथा नहीं होंगे। पार्लियामेंट और विधान सभाओं के तथाकथित दलित रहनुमाओं, यानी, पूँजीवादी-दलितवादी मदारियों के भरोसे तो बिलकुल ही नहीं।
और हाँ, उन संशोधनवादी-अवसरवादियों के भरोसे भी नहीं जो आंबेडकर और मार्क्स को महज इसलिए अवसरवादी तरीके से मिलाते है ताकि ये दलितों के नाम पर उनके जुझारू लड़ाई को वोट हासिल करने का साधन बना सकें और चंद पार्लियामेंट्री सीटें जीत सकें और फिर इसी पूँजीवादी मशीनरी के तहत वाम सरकार बना कर पूँजी की मैनेजरी प्राप्त कर सकें। आज ये यही अपना एकमात्र लक्ष्य बना चुके हैं और मार्क्सवाद और कम्युनिज्म का carricature करते हैं। अगर ये मामूली सबक भी ये नहीं सीख सके हैं तो इनकी अंतिम परिणति एक और बसपा या लोजपा से अधिक नहीं होने वाली है। दोस्तो! हमारी यह बात कड़वी जरूर है लेकिन सत्य है।