Wednesday, 1 March 2017

गधों से प्रेरणा: पूंजीवादी संस्कृति

🌅 सुबह सवेरे 🌅
आजकल हमारे देश के प्रधानमंत्री गधों से प्रेरणा ले रहे हैं और प्रधानमंत्री के भक्‍त प्रधानमंत्री से। ऐसे में ये कहानी जो सेर्गेई मिखाल्कोव ने आज से शायद 50 साल पहले लिखी थी, बेहद प्रासंगिक हो उठती है।
*गधा और ऊदबिलाव*
एक बार की बात है, जंगल के बीचोबीच गलियारे में एक बहुत प्यारा नन्हा पेड़ था ।
एक दिन एक गधा दौड़ता हुआ उस जंगली रास्ते पर आया; लेकिन जब वह दूसरी ओर देख रहा था, उसी समय पेड़ से टकरा गया; और उसे इतनी तेज चोट लगी कि दिन में तारे नजर आने लगे ।
गधे को बहुत गुस्सा आया । वह नदी की ओर गया और बाहर से ऊदबिलाव को, जिसे वह पहले से जानता था, पुकारने लगा-
“मैं पूछता हूँ, ऊदबिलाव! क्या तुम जंगल की उस जगह को जानते हो, जिसके बीचोबीच एक पेड़ लगा हुआ है ।”
“हाँ–हाँ, मैं जानता हूँ!”
“तो तुम मेरा एक काम कर दो-जाओ और उस पेड़ को गिरा दो-तुम्हारे पास तो बहुत नुकीले दाँत हैं ।”
“लेकिन तुम इस धरती पर किसलिए हो ?”
“मेरा सिर उससे टकरा गया, देखो यह गूमड़-कितना बड़ा–सा है ?”
“तुम्हारी नजरें कहाँ थीं ?”
“कहाँ ? कहाँ थी मतलब ? मैं दूसरी ओर देख रहा था! मेहरबानी करके जाओ और पेड़ को काट डालो!”
“मैं ऐसा नहीं कर सकता । जंगली रास्ते में वह बहुत अच्छा लगता है ।”
“लेकिन वह मेरे रास्ते में आया । मेरे लिए उसे काट डालो, ऊदबिलाव!”
“नहीं, मैं नहीं काटूँगा!”
“ये क्या बात हुई; क्या यह तुम्हारे लिए बहुत कठिन है ?”
“नहीं, पर मैं ऐसा नहीं करूँगा, चाहे तुम कुछ भी कहो!”
“क्यों नहीं करोगे ?”
“क्योंकि अगर मैंने ऐसा कर भी दिया, तो तुम किसी झाड़ी से टकरा जाओगे!”
“तो तुम झाड़ी को उखाड़ देना ।”
“अगर मैंने ऐसा भी कर दिया तो तुम किसी गड्ढे में गिर जाओगे और अपनी टाँगें तुड़वा लोगे ।”
“मैं क्यों ऐसा करूँगा ?”
“क्योंकि तुम एक गधे हो ।” ऊदबिलाव ने कहा।
साभार Satya Narayan

"मानसिक बीमारी का इलाज तो है पर पूंजीवाद में? जो खुद ही निरंतर अज्ञानता और अन्धविश्वाश पैदा करता है? मज़बूरी है धर्म, जाति, व्यक्तिवाद को बढ़ाना, ताकि असली दुश्मन छुपा रहे और मजदुर वर्ग बेरोजगारी, गरीबी, आतंकवाद और युद्ध के खिलाफ ना एकजुट हो जाएँ और संघर्ष करें!"

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