Wednesday, 18 January 2017

Jallikattu

Mukesh Tyagi

इस वक्त तमिलनाडु में पिछले 80 वर्ष का सबसे भयंकर सूखा पड़ा है, गरीब किसान-खेत मजदूर बेहद तकलीफदेह हालात में हैं, जीवन चलाने के लिए अपनी थोड़ी-बहुत मिलकियत को सूदखोरों के पास गिरवी रख रहे हैं। उसके बारे में कितने लोगों ने सुना है?
अभी ही आईटी कंपनी कर्मचारी, व्यावसायिक कॉलिजों के छात्र (सहयोग के लिए कॉलिजों ने छुट्टी कर दी है!), वकील, आदि खाया अघाया वह तबका जो मेहनतकशों के किसी भी आंदोलन-हड़ताल पर नफरत का बांध तोड़ देता है, तमिल 'कल्चर' बचाने के लिए मरीना बीच जैसी जगहों पर आंदोलन के लिए आ गया है, कहा जा रहा है कि यह स्वतः-स्फूर्त अराजनीतिक है, कोई नेता-संगठन नहीं है (पर साउंड सिस्टम है, अन्य व्यवस्था है!) ऐसे ही खाते-पीते तबके में लोकप्रिय अंग्रेजी मीडिया तो कल शाम से ही निरन्तर कवरेज और राजनीतिविहीन आंदोलन की तारीफ में कसीदे काढ़ने में जुट गया है। बीजेपी प्रवक्ता भी संस्कृति प्रेम के घोर प्रदर्शन में जुट गए हैं - विशेष तबको की ही संस्कृति में दखल की शिकायत भी होने लगी है (बिरयानी पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं?)
ऐसा ही एक आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ था, कुछ साल पहले, याद है?

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